एशिया का सूर्य : भगवान बुद्ध
इस संसार में दुःख है.
दुःख का कारण तृष्णा है.
तृष्णा को नष्ट करने पर दुःख दूर किया जा सकता है.
इसके लिये अष्टांगिक मार्ग ग्रहण करना चाहिए.
उपर्युक्त चार वाक्यों से आप समझ चुके होंगे कि यह बौद्ध धर्म के चार आर्य-सत्य हैं. आर्य क्यों कहा गया ? क्या सिद्धार्थ का संबंध अर्यों से है ? क्या है इसका सच ? हम इस ब्लॉग में भगवान बुद्ध से जुड़ी कुछ रोचक जानकारियों को आपके साथ साझा करेंगे ---
आर्य क्या है ?
आर्य किसी जाति का नहीं बल्कि एक विशेष विचारधारा को मानने वाले का समूह था जिसमें श्वेत, पित, रक्त, श्याम और अश्वेत रंग के सभी लोग शामिल थे। अर्थात : आर्य शब्द का प्रयोग महाकुल, कुलीन, सभ्य, सज्जन, साधु आदि के लिए पाया जाता है।
राजकुमार से बुद्ध होने तक का सफर :
इनका जन्म लुंबिनी में 563 ईसा पूर्व इक्ष्वाकु वंशीय क्षत्रिय शाक्य कुल के राजा शुद्धोधन के घर में हुआ था। उनकी माँ का नाम महामाया था जो कोलीय वंश से थीं, जिनका इनके जन्म के सात दिन बाद निधन हुआ, उनका पालन महारानी की छोटी सगी बहन महाप्रजापती गौतमी ने किया। 29 वर्ष की आयुु में सिद्धार्थ विवाहोपरांत एक मात्र प्रथम नवजात शिशु राहुल और धर्मपत्नी यशोधरा को त्यागकर संसार को जरा, मरण, दुखों से मुक्ति दिलाने के एवं सत्य दिव्य ज्ञान की खोज में रात्रि में राजपाठ का मोह त्यागकर वन की ओर चले गए। वर्षों की कठोर साधना के पश्चात बोध गया (बिहार) में बोधि वृक्ष के नीचे उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई और वे सिद्धार्थ गौतम से भगवान बुद्ध बन गये.
बुद्ध से जुड़े अभिलेख सिद्ध करते हैं कि राम और बुद्ध का वंश इक्षवाकु था. ऐसा माना जाता है कि शाक्य वंश कि जड़े ईसा के जन्म से 7 हजार साल पहले तक जाती है. जो इस लिंक से जाना जा सकता है :
https://m-hindi.webdunia.com/sanatan-dharma-history/gautam-buddha-and-lord-ram-119040900078_1.html
सत्य कि खोज में सिद्धार्थ तप करते रहे लेकिन इन्हे ज्ञान मिला एक स्त्री की वजह से. जब तप करते करते इनका शरीर सूख कर कांटा हो चुका था तब इन्हे एक ऐसा मार्ग चाहिए जो मध्यम हो जिसे एक साधारण व्यक्ति भी कर सके और स्वयं को जान सके. इनका कथन था कि ईश्वर के पीछे भागने से कुछ नहीं मिलेगा, बल्कि स्वयं को अज्ञानता और अंधकार से मुक्त होना चाहिए. ईश्वर के संदर्भ में हमेशा मौन होना तथा विपस्याना में ध्यान को स्थिर रखना ही इनका कार्य था.अतः तप से वापस आकार एक वट वृक्ष के नीचे ध्यान करने लगे. एक दिन एक स्त्री खीर लेकर इनके पास आई और बोली आप देव पुरुष लगते हैं. आपका धन्यवाद करती हूँ कि मैंने एक सुंदर पुत्र को जन्म दिया है.इसलिए आप यह खीर खाकर मुझे कृतार्थ करें. सिद्धार्थ ने वह खीर खाई तो उनके शिष्य उनसे नाराज हो गए कि वह स्त्री एक अछूत है लेकिन बुद्ध तो जातिवाद कि विचारधारा से ऊपर थे अतः शिष्यों को समानता का उपदेश दिया. कहते स्त्री के सरल विचारों के बाद ही उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ और वह सिद्धार्थ से गौतम बुद्ध बन गए.
इनका संदेश भगवान के संदर्भ में अलग था -जो स्वयं को अज्ञानता और पाखण्ड से मुक्त कर आत्म साक्षात्कार करले वही भगवान है.
-- Arvind Kumar
Times Network
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