संदेश

विरासत

 आर्यावर्ते भरत खंडे! क्यों कहें हम गर्व से? जय भवानी-जय शिवाजी, विरासत हैं कर्म से नहीं करो उम्मीद हिन्द से, सरकार फ़ारसी से आया, हिंदी अपनी- नाम फ़ारसी, प्रेम करें अंग्रेजी से।।आर्यावर्ते.....1 किया प्रयाग-इलाहाबाद से, कान्धार हुआ, गांधार से, नाम बदलते हैं योगी जी, मुग़ल नाचते शान से।।आर्यावर्ते.....2 नदियाँ त्रस्त प्रदूषण से, जंगल कटते शान से, रोजगार है स्वर्ण से महंगा, महंगाई बढ़ती शान से।।आर्यावर्ते.....3 चीख रही स्त्री भारत में, कहते थे नारी पूजित है, इतिहास नहीं कोई पढ़ता अब, पापी पूजित देश में।।आर्यावर्ते.....4 महाजनपदों में बटा हुआ था, फिर भी शासक एक था, कभी भरत, कभी चन्द्रगुप्त सा अखण्ड भारत देश था।।आर्यावर्ते.....5 आपस में जैसे लड़ते थे राजा, अब लड़े पार्टियां, भूले काजा नेहरू लाये तीन सौ सत्तर, गाँधी कहते तीन बंदर आजादी के लिये लड़े, तो क्यों मारे नाथू शान से आर्यावर्ते.....6 जो भारत को तोड़ रहे थे, आज वही फिर जोड़ रहे, जो चिल्लाते टुकड़े होंगे,सबसे आगे दौड़ रहे, राम नाम न, भारत माता, अल्लाह कहते शान से आर्यावर्ते.....7 नहीं भाग्य से देश बदलता, और नहीं यह जीवन बदले, कर्म बदलता जीवन...

!! चासनी के चार दिन !!

कुछ अद्भुत लीला है जग की, यह माया है मायाधर की। जो सोंचा था, वह हुआ नहीं जो होता है, वह पता नहीं जीवित को भोजन, वसन नहीं घरबार नहीं, जलधार नहीं खण्ड खण्ड करके मंगल जा पहुंचा है अब मंगल पर  पत्थर से जीवन निकला था, यह नगरी केवल पत्थर की, कुछ अद्भुत लीला है जग की, यह माया है मायाधर की।......(1) सब मस्त मगन हैं अपने में कुछ कोठे में, कुछ सरबत में कुछ चोरी में, कुछ छोरी में करी चाकरी जीवन भर, पर कुछ न मिला कटोरी में चपके हैं बड़बोली में, जैसी कृति, विकृति वैसी, यह परिणति पालन पोषण की, कुछ अद्भुत लीला है जग की, यह माया है मायाधर की।.....(2) मिले नहीं उसको कुछ भी जिसे चाहिए धन, वैभव विद्या है आधार धनों का दासी है व्यापार जनों का निश्चित नहीं अब स्वर्ग किसी का जिसका कब्जा, राज उसी का मौका है तो चौका है, मजबूरी नहीं बताने की, कुछ अद्भुत लीला है जग की, यह माया है मायाधर की।.......(3) नदियों पर है सागर का हक सुंदरियों पर धनवानों का, आसमान पर बिजली का हक सीधे पर शैतानों का  तुम पानी पियो, चलो निकलो कुछ सोचो समझो फिर बोलो जो लड़े सिंह की तरह सदा, जीवन में जीत उसी की, कुछ अद्भुत लीला है जग की...

एशिया का सूर्य : भगवान बुद्ध

इस संसार में दुःख है. दुःख का कारण तृष्णा है. तृष्णा को नष्ट करने पर दुःख दूर किया जा सकता है. इसके लिये अष्टांगिक मार्ग ग्रहण करना चाहिए. उपर्युक्त चार वाक्यों से आप समझ चुके होंगे कि यह बौद्ध धर्म के चार आर्य-सत्य हैं. आर्य क्यों कहा गया ? क्या सिद्धार्थ का संबंध अर्यों से है ? क्या है इसका सच ? हम इस ब्लॉग में भगवान बुद्ध से जुड़ी कुछ रोचक जानकारियों को आपके साथ साझा करेंगे --- आर्य क्या है ? आर्य किसी जाति का नहीं बल्कि एक विशेष विचारधारा को मानने वाले का समूह था जिसमें श्‍वेत, पित, रक्त, श्याम और अश्‍वेत रंग के सभी लोग शामिल थे। अर्थात : आर्य शब्द का प्रयोग महाकुल, कुलीन, सभ्य, सज्जन, साधु आदि के लिए पाया जाता है। राजकुमार से बुद्ध होने तक का सफर : इनका जन्म लुंबिनी में 563 ईसा पूर्व इक्ष्वाकु वंशीय क्षत्रिय शाक्य कुल के राजा शुद्धोधन के घर में हुआ था। उनकी माँ का नाम महामाया था जो कोलीय वंश से थीं, जिनका इनके जन्म के सात दिन बाद निधन हुआ, उनका पालन महारानी की छोटी सगी बहन महाप्रजापती गौतमी ने किया। 29 वर्ष की आयुु में सिद्धार्थ विवाहोपरांत एक मात्र प्रथम नवजात शिशु राहुल और धर्...

आब-ए-ज़मज़म

 आब-ए-ज़मज़म सऊदी अरब के मक्का शहर में काबा से 20 मीटर दूर मस्जिद अल हरम में स्थापित एक कुंआ है लेकिन यह कोई      साधरण कुंआ नहीं है क्योंकि इसका पानी कभी सूखता नहीं और न ही ख़राब होता है। यह गंगा जल के समान शुद्ध और पवित्र माना जाता है। हज यात्री जब भी काबा के दर्शन के लिये मक्का शहर जाते हैं तो वहाँ से इसी कुंए का पानी अपने साथ घर लेकर आते है जिस तरह हिन्दू धर्म के लोग गंगा जल को पवित्र मानकर पूजा पाठ में इस्तेमाल करते हैं वैसे ही इस्लाम में प्रत्येक मुस्लिम के घर पर आब ए जमजम का जल मौजूद होता है।  ईसा मसीह के जन्म से 2 हजार साल पहले हज़रत इब्राहिम जिन्हें यहूदी धर्म में अब्राहम कहा जाता है इन्होंने अल्लाह (ईश्वर)के आदेश से अपनी पत्नी हाजिरा और पुत्र स्माइल को एक रेगिस्तान(मक्का की खाड़ी) में छोड़ दिया था और खुद फिलिस्तीन शहर की तरफ जाने लगे तो उनकी पत्नी ने पूछा - क्या हम थोड़े से खजूर और पानी के साथ यहां अकेले रहेंगे लेकिन इब्राहिम ने इसका कोई जवाब नहीं दिया और उन दोनों को छोड़कर चले गए।  उस वक़्त यहाँ न इतनी इमारते थीं और न ही रहने वाले लोगों की इतनी जनसंख्या, ...

शैक्षिक बेरोजगार

  कान्वेंट स्कूल अरबपति बनते गए और हम भिखारी बनते गए क्यों ? सरकारी स्कूल झोपड़ पट्टी बन गए तो प्राइवेट स्कूलों की चांदी हो गई। पढ़लिखकर बच्चा बड़ा तो हुआ लेकिन सरकारी नौकरी में नेताओं के रिश्तेदार नातेदार, पड़ोसी विरादरी घुस गए और हम चपरासी की लाइन में खड़े होकर आय और जाति प्रमाण पत्र बनवाते रहे क्यों ? भारतीय संविधान में मूलाधिकारों की रक्षा के नाम पर अश्पृश्यता पर अधिनियम तो बन गया लेकिन आज भी शादी विवाह अपनी विरादरी में न हो तो परिवार में महाभारत हो जाता है और शुभद्रा अर्जुन को ले जाती है तो कृष्ण रुक्मिणी के प्रेम में प्रेम विवाह की आधारशिला का अनावरण कर देते हैं। यदि संविधान छुवा छूत को अपराध मानता है तो जाति प्रमाण पत्र क्यों ? सैलरी 3000/- और आय प्रमाण पत्र चाहिए. नीरव मोदी, विजय माल्या, काला धन, नौकरी और कर्ज में अमीरों से कोई प्रमाण माँगा जाता है क्या ?  हमें बेटे को इंग्लिश मीडियम ही पढ़ाना है बेटा भले ही बड़ा होकर चोर बन जाये या प्राइवेट में 5000/- की नौकरी करे लेकिन सरकारी और हिंदी मीडियम तो नहीं पढ़ाएंगे, भारतीय लोगों की इसी मानसिकता ने देश में कान्वेंट स्कूलों को अरबपति...

महामारी नहीं, वायरस युद्ध चल रहा है.

 प्रायः वायरस के तीन रूप मिलते हैं, सजीव, निर्जीव और टेक्निकल और यह तीनों ही हमारे और हमारे समाज के लिये हानिकारक हैं। सजीव और निर्जीव वायरस प्राकृतिक होते हैं लेकिन तीसरा तो स्वयं मानव निर्मित है जो हमारे मोबाईल लैपटॉप और कम्प्यूटर में देखा जाता है लेकिन आज हम जिस वायरस की बात करने जा रहे है वह जैविक है जिसका निर्माण वैज्ञानिक अपनी प्रयोगशाला में कर सकते हैं, करते हैं और आगे भी करेंगे. वर्तमान में जिस वायरस ने  भारत समेत सारे विश्व को अपनी चपेट में ले रखा है और जो लगातार मानवता के लिये ब्रह्मराक्षस बना हुआ है हम उसी चौथे वायरस द्वारा होने वाले नरसंहार की बात कर रहे है जिसे संक्षेप में कोविड -19 कहा गया है। भारत में इस वायरस का पहला केस 30 जनवरी, 2020 को केरल राज्य में मिला और धीरे धीरे इसने आस पास के लोगों को संक्रमित करना शुरू किया। बाहरी देशों, अरब और शार्क देशो तथा पडोसी देशों से लोग आते गए और इस वायरस का विस्तार दिन दूनी रात चौगुना बढ़ता गया।  कब और कहाँ से आया कोविड -19 (कोरोना वायरस) ?  इस विषय पर विचार भिन्न हैं। वायरल खबरों, विश्लेषकों और डॉक्टर्स सहित विशेषज...

हिंदी नहीं हिंदी का शब्द

 इस पृष्ठ में हम मातृभाषा हिंदी में विदेशी शब्दों के आधिपत्य की बात करेंगे और जानेगे कि इसका जन्म कब और कैसे हुआ ? आखिर कैसे हिंदी में विदेशी शब्द आ गए। आपको शायद ही पता हो कि स्वयं हिंदी शब्द भी हिंदी का नहीं है, वास्तव में यह फ़ारसी भाषा का शब्द है क्योंकि फ़ारसी में स को ह पढ़ा जाता है जैसे - मास (महीना/Month)को फ़ारसी में " माह " भी कहते हैं वैसे ही हिंदी शब्द की उत्पत्ति कुछ इस प्रकार है -- हिन्दी शब्द का सम्बन्ध  संस्कृत  शब्द 'सिन्धु' से माना जाता है। 'सिन्धु'  सिन्धु  नदी को कहते थे और उसी आधार पर उसके आस-पास की भूमि को सिन्धु कहने लगे। यह सिन्धु शब्द  ईरानी  में जाकर ‘ हिन्दू’ , हिन्दी और फिर ‘हिन्द’ हो गया। बाद में ईरानी धीरे-धीरे भारत के अधिक भागों से परिचित होते गए और इस शब्द के अर्थ में विस्तार होता गया तथा हिन्द शब्द पूरे भारत का वाचक हो गया। इसी में ईरानी का ईक प्रत्यय लगने से (हिन्द+ईक) ‘हिन्दीक’ बना जिसका अर्थ है ‘हिन्द का’। यूनानी शब्द ‘इण्डिका’ या लैटिन 'इण्डेया' या अंग्रेजी शब्द ‘इण्डिया’ आदि इस ‘हिन्दीक’ के ही दूसरे रूप हैं। हिन्दी भाष...